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    Kuch to baki hai

    पहली मुलाक़ात बारिश उन दिनों कुछ ज़्यादा ही बरस रही थी। जैसे आसमान भी किसी की अधूरी कहानी रो रहा हो। कॉलेज का पहला दिन था — नए चेहरे, नई आवाज़ें, और अनगिनत उम्मीदें हवा में घुली थीं। सान्वी अपने बैग में किताबें समेटते हुए कैंपस के गेट से अंदर आई। बालों की कुछ लटें माथे से चिपक चुकी थीं, और उसके चेहरे पर बारिश की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। उसे कॉलेज जाने की बहुत खुशी थी, पर अंदर एक हल्का डर भी था — “सब कुछ नया है… क्या मैं फिट हो पाऊँगी?” वो धीरे-धीरे चलते हुए क्लास की तरफ बढ़ रही थी जब किसी ने पीछे से पुकारा — “Excuse me, you dropped this!” वो मुड़ी — एक लड़का खड़ा था, हाथ में उसकी नोटबुक लिए हुए। गहरा नीला शर्ट, हल्की दाढ़ी और आंखों में एक अजीब सी शांति। सान्वी ने नोटबुक ली और कहा, “Thanks…” लड़के ने बस मुस्कुराया, कुछ कहा नहीं — और चला गया। वो लड़का था — आरव। कॉलेज का सबसे शांत लेकिन सबसे intense personality वाला लड़का। ना ज़्यादा बोलने वाला, ना ज़्यादा मिलने-जुलने वाला। पर उसकी आंखों में जो ठहराव था, वो किसी को भी कुछ पल के लिए रुक जाने पर मजबूर कर देता था। क्लास में जब सान्वी अंदर पहुंची, तो सीट्स लगभग भर चुकी थीं। सिर्फ आख़िरी बेंच पर एक खाली जगह थी — ठीक आरव के बगल में। वो वहीं जाकर बैठ गई। क्लास शुरू हुई। प्रोफेसर बोले जा रहे थे, पर सान्वी का ध्यान बार-बार खिड़की से आती बारिश की बूंदों पर जा रहा था। और कभी-कभी… उस लड़के पर जो बगल में चुपचाप बैठा था। वो एक शब्द भी नहीं बोल रहा था, बस अपनी नोटबुक में कुछ लिख रहा था। क्लास के बीच में अचानक बिजली चली गई। अंधेरा और बारिश का शोर दोनों मिलकर माहौल को और भी गहरा बना रहे थे। सान्वी की किताब पर कुछ बूंदें गिरीं — और फिर एक जैकेट उसके ऊपर आकर टिक गई। आरव ने बिना कुछ कहे अपनी जैकेट उसके सिर पर डाल दी थी। “तुम भीग जाओगे…” सान्वी ने कहा। आरव बस हल्के से बोला, “तुम्हें ठंड लग जाएगी।” उस पल में कुछ था — कुछ ऐसा जो दोनों ने महसूस किया पर कहा किसी ने नहीं। जैसे दो अनजान लोग अचानक एक ही कहानी के दो किरदार बन गए हों। अगले कुछ दिनों में दोनों बार-बार टकराने लगे। लाइब्रेरी में, कैंटीन में, कॉरिडोर में… हर मुलाक़ात छोटी थी, लेकिन कुछ छोड़ जाती थी। सान्वी को अब आरव की आदत सी होने लगी थी — वो कैसे नोट्स बनाता है, कैसे हमेशा headphones लगाए रहता है, और कैसे किसी को भी नज़रअंदाज़ करते हुए अपने ही दुनिया में खोया रहता है। एक दिन कैंटीन में जब वो कॉफी लेने गई, आरव वहीं बैठा था। किसी ने गलती से सान्वी से टकरा कर उसकी कॉफी गिरा दी — और पूरा कप आरव की किताबों पर जा गिरा। सान्वी घबरा गई — “ओह गॉड! सॉरी… बहुत सॉरी!” आरव ने मुस्कुरा कर कहा, “कोई बात नहीं… गर्म कॉफी से ज़्यादा जलाने वाली बातें मैंने सुनी हैं।” सान्वी को हंसी आ गई, “तो तुम बोल भी लेते हो कभी-कभी?” आरव ने कहा, “बस जब सामने सुनने वाला दिल से सुनता हो।” उस दिन पहली बार दोनों ने खुलकर बात की। और वहीं से उनकी अनकही दोस्ती की शुरुआत हुई। दिन हफ्तों में बदलने लगे। अब दोनों एक-दूसरे की आदत बन चुके थे। कभी साथ में प्रोजेक्ट करते, कभी कैंटीन की कॉफी शेयर करते। और जब लाइब्रेरी में सन्नाटा होता, तो बस उनकी सांसों की आवाज़ सुनी जाती। सान्वी को एहसास होने लगा था कि वो आरव को सिर्फ पसंद नहीं करती, वो उसमें खो जाती है। उसकी चुप्पी में, उसकी नज़रों में, उसकी अधूरी बातों में। एक शाम कॉलेज की छत पर दोनों बैठे थे। सूरज ढल रहा था, हवा में हल्की ठंडक थी। सान्वी ने पूछा, “तुम इतने चुप क्यों रहते हो आरव?” आरव ने आसमान की तरफ देखा, फिर धीमे से बोला, “क्योंकि हर बात कहने लायक नहीं होती सान्वी। कुछ बातें बस महसूस की जाती हैं… जैसे ये हवा, ये शाम, और शायद तुम।” सान्वी चुप रह गई। दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वो उस वक़्त चाहती थी कि आरव बस एक बार कह दे — “I love you.” पर उसने नहीं कहा। कभी-कभी सबसे गहरी बातें वही होती हैं, जो कही नहीं जातीं। एक दिन कॉलेज में कल्चरल इवेंट था। सान्वी ने डांस किया था और आरव ने गाना गाया। जब आरव स्टेज पर आया, तो उसकी आवाज़ सीधी सान्वी के दिल में उतर गई — वो गा रहा था, “कुच्छ तो है तुझसे राब्ता…” गाना ख़त्म होते ही भीड़ ने तालियां बजाईं, पर सान्वी की आंखों में बस आरव था। और आरव की निगाहें भी उसी पर टिक गई थीं। उस रात दोनों को नींद नहीं आई। कुछ था जो अब कहे बिना नहीं रह सकता था। अगले दिन सान्वी ने सोचा — आज मैं बोल दूंगी। वो कॉलेज जल्दी पहुंची, फूलों का छोटा सा बुके लिया, और क्लास के बाहर खड़ी हो गई। लेकिन जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, वो ठिठक गई। अंदर आरव किसी लड़की के साथ बैठा था। वो हंस रहा था, और लड़की उसके कंधे पर हाथ रखे बैठी थी। सान्वी का दिल जैसे किसी ने मरोड़ दिया हो। आंखें नम हो गईं। वो बिना कुछ कहे मुड़ी और चली गई। उसने न तो आरव की बात सुनी, न उसका सच जाना — कि वो लड़की उसकी बचपन की दोस्त थी, जो उस दिन बस कुछ देर के लिए आई थी। सान्वी के लिए वो पल सब कुछ खत्म कर गया। उसकी मोहब्बत, उसकी उम्मीद, उसकी खुशी — सब उसी एक गलतफहमी में डूब गई। रात को सान्वी ने सिर्फ एक मैसेज भेजा — “कुछ कहानियां पूरी नहीं होतीं आरव, क्योंकि शायद उन्हें अधूरा ही रहना होता है…” आरव ने बार-बार कॉल किया, पर उसने जवाब नहीं दिया। अगले दिन वो कॉलेज आई ही नहीं। और फिर कभी नहीं आई। आरव घंटों उसी बेंच पर बैठा रहा, जहां वो दोनों बैठा करते थे। बारिश फिर से शुरू हो गई थी। और वो अपनी जैकेट सीने से लगाए, बस इतना कह पाया — “तुम चली गई सान्वी… पर मुझमें अब भी कुच्छ तो बाकी है…”

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